Wednesday, January 23, 2013

सुभाष !




यदि प्रधानमंत्री बन जाते, अपने वीर सुभाष ।
तो जनता की पूरन होती, मन चाही सब आश।।
     इतना भ्रष्टाचार न होता, ना होता व्यभिचार।
     न गरीब भूखा मर पाता, महंगाई से हार ।।
पाकिस्तान शत्रु बन करके, लुक छिप कर जो  मारे।
कब का सबक सिखा देते,  करके वारे न्यारे  ।।
     दुर्घटना में नहीं मरे वे, यह है गढ़ी कहानी।
                                    छद्म वेश में यहीं रहे वे, सुन होती हैरानी।।
                             -डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Monday, January 21, 2013


                     कर दिया पराया
चौथेपन में जीवनसाथी, यदि हठात् ही छोड़े साथ।
ऐसा अंधकार छा जाता,राह न सूझे, हुए अनाथ॥
सभी जानते , जब जाना हो, कोई संग न आता ।
सब कुछ यहीं छूट जाता है, जैसा भी हो नाता ॥
     सब सद्ग्रंथ यही कहते हैं, कुछ ऐसी करनी कर जाओ।
     अंतकाल जब जाओ जग से, कष्ट न भोगो सद्गति पाओ॥
जीवनसाथी साठ साल तक, तुमने साथ निभाया।
किंतु अचानक क्या सूझा था, जो कर दिया पराया॥
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Wednesday, January 16, 2013


साथी 
पहली बार जिसे पकड़ा था,
वह था मेरा हाथ।
और कहा था , सारा जीवन,
रहना हमको साथ।।
अगणित कष्ट झेल कर तुमने,
हर क्षण साथ निभाया।
मुझे कष्ट हो तुम सह लेती,
ऐसा कभी  न पाया।
रही प्रेरणा जीवन भर तुम,
तभी आज लिख पाता।
वरना पहले छंद काव्य से,
नहीं रहा था नाता।।
तुम वसंत बन कर आयीं,
आंधी बन कर छोड़ा साथ।
साठ बरस तक संग निभाया, 
 अब कर गयीं हठात अनाथ।।
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Thursday, June 28, 2012

‘बाजार में खड़ी है पत्रकारिता, जो कीमत चुकाता है, उसकी बोली बोलने लगती है’

 वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार डॉ. रुक्म त्रिपाठी के उद्गार
-राजेश त्रिपाठी
कोलकाता : पिछले दिनों यहां भारतीय भाषा परिषद के सभागार में हिंदी पत्रकारिता के 186 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में स्थानीय हिंदी दैनिक ‘छपते छपते’ के तत्वावधान में ‘हिंदी पत्रकारिता की 186 वर्ष की यात्राः एक सिंहावलोकन’ विषय पर परिचर्चा और हिंदी के पांच वयोवृद्ध पत्रकारों के सम्मान का समारोह आयोजित किया गया। इसमें डॉ. रुक्म त्रिपाठी, संतन कुमार पांडेय, सुदामा प्रसाद सिंह, मोहम्मद इसराइल अंसारी व रामगोपाल खेतान को पत्रकारिता में उनकी सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र व कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता ने किया। डॉ.मिश्र ने अपने संबोधन में युवा पत्रकारों से पत्रकारिता के उत्कृष्ण प्रतिमानों को पुनः स्थापित करने की अपील की। उन्होंने हिंदी समाचारपत्रों के गौरवमय अतीत की याद दिलाते हुए कहा कि आज पत्रों के कलेवर तो बेहतर हुए हैं लेकिन उनमें संस्कारों और राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति संघर्ष का भाव नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पाठकों का दबाव ही समाचारपत्रों को फिर से जनोन्मुखी बनायेगा।

समारोह के मुख्य अतिथि कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता ने भी समाचापत्रों के स्तर और मूल्यों में गिरावट के प्रति चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समाचारपत्रों के संपादकों और पत्रकारों को खुद इस बारे में समीक्षा करनी चाहिए कि यह स्थिति क्यों आयी।
छपते छपते हिंदी दैनिक परिवार की ओर से पांचों सम्मानित पत्रकारों का सम्मान स्मारक चिह्न प्रदान करने के अलावा शाल ओढ़ा कर और उत्तरीय प्रदान कर सम्मानित किया गया। सम्मानित पत्रकारों ने पत्रकारिता के बारे में अपने विचार व्यक्ति किये। पत्रकारिता के गिरते स्तर के बारे में डॉ. रुक्म त्रिपाठी ने कहा कि आज पत्रकारिता बाजार में खड़ी है, जो भी उसकी कीमत चुकाता है, यह उसी के बोल बोलने लगती है। 
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. रुक्म त्रिपाठी ने कहा-‘ मैंने आधी शताब्दी से भी अधिक समय पत्रकारिता और लेखन में गुजारा है। मैं पत्रकारिता के अतीत से वर्तमान तक से सक्रिय रूप से जुड़ा रहा हूं और इसके उत्थान-पतन का साक्षी रहा हूं। आज जब हम इसकी उपलब्धि का आकलन करते हैं तो हमारे सामने इसके उत्कर्ष और पतन के पक्ष उजागर होते हैं। पत्रकारिता का जिसे स्वर्ण युग कह सकते हैं वह इसके प्रारंभ के वर्ष थे जब इसका उद्देश्य, इसके सिद्धांत और निष्ठा ही इसका सबसे बड़ा धन होते थे। यह सत्यम् शिवम् सुंदरम् के उद्देश्य पर आधारित पत्रकारिता थी। यानी जो सत्य है कल्याणकारी है उसकी प्रतिष्ठा और जो स्वेच्छारिता, अन्याय अनाचार है उसकी निर्भीक होकर समालोचना ही इसका धर्म था। तब पत्रकार एक ध्येय एक निष्ठा लेकर चलते थे जो बिकाऊ नहीं थी। तब पैसे के मोह में सामाजिक दायित्वों को तिलांजलि दे कोई ठकुरसुहाती नहीं लिखता था। वह स्वाधीनता आंदोलन का युग था। हिंदी पत्रकारिता ओतप्रोत भाव से इस आंदोलन को प्रोत्साहित करने इसे अपना सक्षम समर्थन देने में जुटी थी। पत्रकारिता के कई मनीषियों को इसके चलते ब्रिटिश राज का कोपभाजन भी बनना पड़ा लेकिन वे अपने उद्देश्य से नहीं डिगे। हिंदी पत्रकारिता का अतीत जितना निर्मल और उज्जवल था, इसका वर्तमान उतना ही कलुषित, दिशाहीन और सामाजिक सरोकार से कटा हुआ है।आज जब हम इसके अतीत और वर्तमान का आकलन करने बैठते हैं तो सबसे पहले यही प्रश्न आता है कि क्या वर्षों पूर्व जब पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था,तब से आज तक क्या यह अपने उद्देश्यों और सिद्धांतों पर अडिग रह पायी है। हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि पत्रकारिता अपने मूल्य उद्देश्यों और न सिद्धांतों ने न सिर्फ भटकी है अपितु दिशाहीन भी हो गयी है। आज इसमें मूल्यों का क्षरण, सिद्धांतों और उद्देश्यों का निर्मम हनन हो रहा है। यह अपने सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों से विमुख हो स्वेच्छारी और स्वार्थी हो गयी है।

कभी पकारिता मिशन थी आज मोनोपोली है। जिसकी जैसी इच्छा अपने हित में इसका इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में इसका सत्यम् शिवम् सुंदरम् का सिद्धांत छीजता जा रहा है। कभी देश के स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरक और प्राण शक्ति रही पत्रकारिता उद्देश्यहीन हो बाजार में आ खड़ी ई है। जो चाहता है इसकी मुंहमांगी कीमत चुकाता है और यह उसके ही बोल बोलने लगती है। अपने सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे यह ऐसे हाथों में खेलने लगी है,जो इसे स्वेच्छाचारी और स्वार्थी बना रहे हैं। यह पतन की उस राह पर चल पड़ी है, जहां से अगर इसे अभी नहीं उबारा गया तो बहुत देर हो जायेगी।
 वैसे इस अराजक दौर और निराशा के घटाटोप में भी ऐसे निष्ठावान पत्रकार आज भी हैं जिनकी कलम बिकाऊ नहीं है। यही भविष्य के लिए उम्मीद की किरण हैं। आज पत्रकारिता ऊहापोह और विवशता के दोराहे पर आ खड़ी हुई है। दोराहा जहां उसके सामने व्यावसायिकता और राजनीतिक व अन्य दबावों का संकट है। दिनों दिन प्रकाशन संबंधी वस्तुओं की कीमतों से उसके सामने अस्तित्व का भी संकट है जिसके चलते उसे न चाहते हुए भी कुछ ऐसे समझौते करने पड़ते हैं जहां मूल्यों और सिद्धांतों को बलि देने को विवश होना पड़ता है। गलाकाट प्रतियोगिता और बदलते सामाजिक, राजनीतिक मूल्यों से उपजे दबाव के चलते पत्रकारिता अपने मूल्य उद्देश्यों से भटकती जा रही है। ऐसे में हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या वाकई पत्रकारिता 186 साल बाद उस ऊंचाई पर पहुंची है जहां उसे होना चाहिए था। जहां उसके पहुंचाने का स्वप्न इसके पुरोधाओं ने देखा था। क्या वाकई वह सार्थक और सक्षम तौर पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका निभाने में सफल रही है। जहां तक पत्रकारिता की प्रगति का प्रश्न है इसने तकनीकी ढंग से बेहद प्रगति की है लेकिन उसके नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आज जो चाहे इसे अपने ढंग से इस्तेमाल कर सकता है। कभी पत्रकारिता मिशन थी आज मोनोपोली है। जिसकी जैसी इच्छा अपने हित में इसका इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में इसका सत्यम् शिवम् सुंदरम् का सिद्धांत छीजता जा रहा है। कभी देश के स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरक और प्राण शक्ति रही पत्रकारिता उद्देश्यहीन हो बाजार में आ खड़ी ई है। जो चाहता है इसकी मुंहमांगी कीमत चुकाता है और यह उसके ही बोल बोलने लगती है। अपने सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे यह ऐसे हाथों में खेलने लगी है,जो इसे स्वेच्छाचारी और स्वार्थी बना रहे हैं। यह पतन की उस राह पर चल पड़ी है, जहां से अगर इसे अभी नहीं उबारा गया तो बहुत देर हो जायेगी। वैसे आज भी कुछ सार्थक पत्रकारिता के सारथी हैं जिन्हें अपने ध्येय, अपनी निष्ठा और सिद्धांतों से प्रेम है, वे बिके नहीं और यही हमारे लिए आशा की किरण के समान हैं। इन्हें प्रणाम और इसके कार्य को साधुवाद।’


कार्यक्रम के सूत्रधार और छपते-छपते के संपादक विश्वंभर नेवर ने अपने स्वागत भाषण में पत्रकारों की अंतर्वेदना और संघर्ष का जिक्र किया। संचालन सुश्री राजप्रभा दासानी ने किया।



जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता उत्तरीय प्रदान कर
 डॉ. रुक्म त्रिपाठी का सम्मान कर उनसे हाथ मिलाते हुए।
 साथ हैं डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र और विश्वंभर नेवर






Wednesday, February 9, 2011

स्वागत श्री ऋतुराज

डा. रुक्म त्रिपाठी
कुहू कुहू कर कोकिला,
गाती फिरती आज।
कृपया स्वागत कीजिए,
आये श्री ऋतुराज ॥

गुन गुन करता बाग में,
गाता है मृदु छंद ।
अली कली मुख चूम कर,
चूस रहा मकरंद ॥

विरही भामिन भावती,
दूर बसे जा कंत।
जाने अब कब मिलन हो,
बीत न जाय बसंत ॥

कामदेव-रति से लगें,
आनंदित दो मित्र ।
यदाकदा दिख रहे ज्यों,
खजुराहो के चित्र ॥

मलयानिल है बांटता,
मनमोहिनी सुवास ।
मनमयूर नर्तन करे,
जब प्रिय हों अति पास ॥

सरसों फूले खेत में,
पसरा आज बसंत।
रंग बसंती का नहीं,
दूर दूर तक अंत ॥

कहीं कहीं होने लगी,
ढोलक ध्वनि संग फाग।
लाल लाल टेसू लगें,
वन में दहकी आग ॥

निर्झर का झर झर लगे,
बजता ज्यों संतूर ।
मानो वह ऋतुराज पर,
मुग्ध आज भरपूर ॥

पतझड़ बीते ही दिखे,
नवपल्लव का दौर।
अतिशय यौवन-भार से,
झुकी आम की बौर ॥

Monday, January 24, 2011

मोरारजी का आटोग्राफ

डा. रुक्म त्रिपाठी
प्रसंग पचास के अर्धदशक का है। वैष्णव देवी कटरा स्थित विश्वायतन योगाश्रम से स्वामी कार्तिकेय के शिष्य स्वामी हरि भक्त चैतन्य तथा धीरेंद्र ब्रह्मचारी योग का प्रचार करने कलकत्ता आये थे। उन्होंने रेड रोड के बगल में स्थित मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब के निकट विश्वायतन योग शिविर आरंभ किया।
स्वामी हरिभक्त जितने गंभीर थे, उनके गुरु भाई धीरेंद्र उतने ही मुखर। योग प्रशिक्षण धीरेंद्र जी ही देते थे। हरिभक्त जी केवल प्रशिक्षणार्थियों को देखते रहते थे। चूंकि कलकत्ता का फेफड़ा कहलाने वाले विक्टोरिया मेमोरियल के मैदान जानेवाले वायु सेवनार्थी रेड रोड से गुजरते थे, इसलिए उनमें से योग के प्रति रुचि रखनेवाले शिविर में प्रशिक्षणार्थ आने लगे।
उस शिविर में योगिक क्रिया देखने के लिए बहुतों के कदम रुक जाते।
एक दिन प्रसिद्ध नेता मोरारजी भाई देसाई भी जब वहां पधारे तो प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे, धनाढ्य परिवार के दो नन्हें बच्चे अपनी आटोग्राफ बुक उनकी ओर बढ़ाते हुए आटोग्राफ मांगने लगे। तो मोरारजी ने उन्हें लंगोट और गंजी पहने देख कर कहा-‘पहले खद्दर पहन कर आओ।’
उनकी शर्त सुनते ही बच्चे निराश हो गये।
उन दिनों मैं खद्दर ही पहनता था। मैंने खद्दर का पाजामा और कुर्ता पहन कर दोनों की आटोग्राफ बुक लेकर मोरारजी से कहा-‘मैं खादी ग्रामोद्योग भवन के शुद्ध खद्दर से बने कुर्ता, पाजामा पहने हूं, कृपया अब तो आप आटोग्राफ देने से इनकार नहीं करेंगे। ’
उन्होंने मेरा कुर्ता-पाजामा देखा और दोनों आटोग्राफ बुक में आटोग्राफ दे दिया। मैंने बच्चों को उनकी बुक लौटाने के बाद हाथ जोड़ कर मोरारजी से प्रार्थना की,‘आप राष्ट्रीय स्तर के सर्वमान्य नेता हैं , रईस घरों के नन्हें बच्चे खद्दर क्यों पहनने लगे? अपनी शर्त में इन नन्हें- मुन्नों को छूट दे दी होती, तो वे उदास न होते, आपके चरण छू लेते। ’
मोरारजी ने कोई उत्तर नहीं दिया। अन्यमनस्क हो मैदान की ओर वायु सेवन के लिए चल दिये।
कालांतर में जब वे प्रधानमंत्री बने, तो जापान की एक युवती जब उनसे मिलने गयी, तो उन्होंने उसे सहर्ष आटोग्राफ दे दिया। तब सिंथेटिक कपड़े पहने उस युवती को उन्होंने खादी पहन कर आने को नहीं कहा।
जब यह समाचार अखबारों में उछाला गया, तो मैंने एक शिकायती पत्र मोरारजी के पास भेजा था, जिसमें उन नन्हें मुन्नों को आटोग्राफ देने से इनकार करने का जिक्र था। मैंने अपने पत्र में पूछा था , -‘उस जापानी युवती को आपने शर्त में छूट क्यों दी?’ किंतु अफसोस, उन्होंने मेरे उस पत्र का उत्तर कभी नहीं दिया।

Saturday, June 19, 2010

बच गये बेचारे सूर, तुलसी



वरना ये महाशय उन्हें कचडे के ढेर में फिकवा कर दम लेते
-डॉ.रुक्म त्रिपाठी

एक पत्रकार और कहानीकार, जिन्हें आप सहज ही पहचान जायेंगे वे आयु में सत्तर पार कर चुके हैं किंतु अपने को नये लेखकों का ‘गॉडफादर’ मानते हैं और उन्हें मंच देने के लिए पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों की अपेक्षा उन्हीं की रचनाएं छापते हैं।
उनका कहना है, ‘नितांत नये लेखकों की पुस्तकें किसी भी स्थापित लेखक से कम नहीं बिकतीं। नये लेखकों की पुस्तकों के दूसरे संस्करण भी छप रहे हैं। इसका कारण है कि नये लेखकों का सृजन फलक बड़ा है। मेरी समझ से नयी पीढ़ी , हवा के ताजे झोंके की तरह आयी और पुरानी पीढ़ी द्वारा फैलाये गये प्रदूषण को बुहार कर कूड़े के ढेर में फेंक दिया। इनके कथ्य, इनकी भाषा. इनकी संवेदना और तेवर बिल्कुल नये और ताजे हैं, जो हर उम्र के पाठकों को मोह रहे हैं।’ (जैसे आप जैसे सत्तर वर्षीय युवा संपादक को मोह रहे हैं)।
बड़बोले जी! हमें आश्चर्य है कि शिक्षा विभाग आज भी छोटी कक्षाओं से लेकर स्नातकोत्तर तक पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों के प्रदूषण फैलाने वाले साहित्य को पाठ्यक्रम के रूप में क्यों रखे है? उसे कूड़ेदान में फेंक कर नयी पीढ़ी के साहित्य को क्यों नहीं रखता? कथाकार प्रेमचंद, ‘कामायनीज’ के रचनाकार जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, अमृतलाल नागर, भैरवप्रसाद गुप्त, आचार्य शिवपूजन सहाय, यशपाल, कृष्णचंदर आदि की पुस्तकों के अब तक दर्जनों संस्करण निकल चुके हैं और आगे भी निकलेंगे। पाठकों में प्रदूषण फैलानेवाले इनके साहित्य को कूड़े में क्यों नहीं फेंक दिया जाता?
बड़बोले जी को इस ज्ञान की प्राप्ति तब हुई , जब उनके राज्य से उन्हें वहां का निवासी साहित्कार होने के नाते ढाई लाख का पुरस्कार मिला है। (किसी अन्य राज्य ने उनके साहित्य सृजन का ऐसा मूल्यांकन क्यों नहीं किया?)।
उनका कहना है कि अब मैं ढाई लाख से कम का पुरस्कार ग्रहण नहीं करूंगा। लाख रुपये के पुरस्कार छुटभैयों के लिए छोड़ रहा हूं।
शायद उन्हें पता नहीं है (बड़े नगरवासी होने के कारण) कि नयी शैली की कहानियों और छंदमुक्त कविताओं के पाठक मुश्किल से बीस प्रतिशत हैं, जबकि प्राचीन साहित्य ग्रामीण पाठकों में आज भी लोकप्रिय है , जो बार-बार पढ़ा जाता है। विश्वास न हो तो गांवों के पाठकों की रुचि का सर्वे करवा कर देख लीजिए। मेरा जन्म गांव में हुआ है इसलिए मैं आज भी वहां देवकीनंदन खत्री और प्रेमचंद के उपन्यास तथा कहानियों को बड़े चाव से पढ़ते देखता हूं।
क्षमा करें बड़बोले जी! आपने सत्तर से अधिक उम्र का होते हुए भी पुरानी पीढ़ी के सम्माननीय, आपसे अधिक प्रतिष्ठित विद्वान लेखकों की रचनाओं को प्रदूषण फैलानेवाला कहा इसलिए बरदाश्त नहीं हुआ। आप भी तो मां के पेट से साहित्य सीख कर नहीं आये, इस प्रदूषण (आपकी भाषा में, हम तो इसे पावन चंदन की सुगंध मानते हैं) को पढ़ कर ही तो आपने साहित्य सृजन की शक्ति और सामर्थ्य पाया। यह तो आपका आधार है इसे ही काट देंगे तो औंधे मुंह जमीन पर आ गिरेंगे। एक बात और कहा गया है कि विद्या ददाति विनयम् विनयात यात पात्रताम् यानी विद्या विनय देती है और विनयी भाव से ही व्यक्ति में पात्रता या योग्यता आती है। इतना दंभ आपमें कहां से भर गया कि आप उस साहित्य के शलाका पुरुषों को ही कचड़ा कहने लगे जिसे सीख कर आप आज इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हैं। बड़बोले जी! ऊंचाई में चढ़ने के बाद उन सीढ़िय़ों को नहीं भूला करते जिनके सहारे आप वहां पहुंचे हैं खुदा न खास्ता कल ऊंचाई आपको नकार दें तो आप कहां जायेंगे।
काश आपको साहित्य का नोबल पुरस्कार मिल गया होता तो पता नहीं सूर, तुलसी, रहीम, कबीर, बिहारी, केशव,पद्माकर, केशव, विद्यापति आदि की ये कैसी आरती उतारते।
हम नये रचनाकारों के साहित्य सृजन विरोधी नहीं हैं। उनमें नयी दृष्टि. नयी शैली और नया सोच है। वे बेहतर लिख रहे हैं। साहित्य में नया रंग नया प्रकाश ला रहे हैं। युग परिवर्तनशील है और साहित्य में भी यह परिवर्तन सुखद संकेत और इसकी श्री वृद्धि का परिचायक है लेकिन शायद वे भी अपने शलाका पुरुषों (जिनके साहित्य ने उन्हें राह दिखायी) को कचड़ा या प्रदूषण फैलानेवाला नहीं कहेंगे। बड़बोले जी! माफ कीजिएगा सूरज पर थूकने से अपने ही सिर पर आ गिरता है। संभलिए और अपने से बड़ो को सम्मान देना सीखिए। आप साधारण इनसान हैं खुद को साहित्य का भगवान मानने का भ्रम मत पालिए। लिखना कम समझना ज्यादा। आशा है अन्यथा नहीं लेंगे।