Sunday, May 4, 2014

स्टिंग आपरेशन !

साधुवाद उनको देते हम, जो हैं ऐसे चैनल वाले।
उनको बेनकाब करते हैं, करते हैं जो धंधे काले॥
    स्टिंग आपरेशन करके वे, बिना खौफ सब कुछ दिखलाते।
    बड़े बने जो इज्जतवाले, उनका असली रूप बताते॥
ऐसा होता रहा अगर जो, तो अपराधी नहीं बचेंगे।
गुप्त कैमरे छिपा कर उनको, जहां छिपेंगे वहीं धरेंगे॥
    कितने नेता धूल चाटते, आसमान पर थे इतराते।
    धन कुबेर भी फंस जाते हैं, पैसे देकर जो बच जाते॥
                                     -डॉ. रुक्म त्रिपाठी

ये गठबंधन की सरकारें!

गठबंधन की सरकारों में, होती जम कर सौदेबाजी।
पद भी लें, रुपये भी ऐंठें, तभी साथ देते कुछ पाजी॥
    इस पर भी उनके नखरों को, मजबूरन ही सहना होता।
    गर सरकार बचानी हो तो, 'हां' में 'हां' करना ही होता॥
दल बदलू कानून बना जो, उसकी देखें छीछालेदर।
सुबह-शाम दल बदले जाते, कुछ होता ना इसको लेकर॥
    ऐसे में विकास की आशा, कैसे करें जरा समझायें।
    वे चिंता में डूबे रहते, कुर्सी अपनी खिसक न जाये॥
                         -डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Sunday, December 29, 2013

इंतजार



 कहानी
 डॉ. रुक्म त्रिपाठी
      सुबह-सुबह एक मनहूस खबर से सारा कस्बा सन्न रह गया। जिस वैद्य ने डायरिया के सैकड़ों रोगियों की जान बचायी, वह उसी की चपेट में कस्बे के बाहर सरकारी अस्पताल में पड़ा छटपटा रहा है।
      चोटे वैद्य चंद्रप्रकाश दुबे, जिनकी बदौलत कस्बे का एक भी आदमी डायरियासे मरने नहीं पाया, वह आज खुद मौते से लड़ रहाहै। उन्होंने दवा के रूप में एक ऐसी संजीवनी तैयारकी थी , जो डायरिया के रोगी को मौत के जबड़े से निकाल लाती। वह संजीवनी इन्होंने खुद क्यों नहीं ली, हर आदमी यही सोच रहा था।
      कस्बे के बाहर एक छोटा सा तीन कमरे का अस्पताल था। जिसमें दो साल बाद रिटायर होने वाले डाक्टर हरि नारायण वर्मा औरअधेड़ उम्र के कंपाउंडर देवव्रत दास तो थे, लेकिन दवा एक भी नहीं थी।
      रोगी आता। डाक्टर वर्मा उसकी जांच करते।दवा का पुर्जा थमा देते। उनमें से कुछ दवाएं ही कस्बे के छोटे मेडिकल स्टोर में मिल पातीं। बाकी दवाओं के लिए पच्चीस मील दूर शहर जाना पड़ता।
      कस्बे के लोगों ने कई बार डाक्टर साहब से प्रार्थना की थी, 'कम से कम प्लेग, डायरिया और सांप के डंसने की दवा तो रखिए।'
      डाक्टर वर्मा एक ही जवाब देते-'मैंने मेडिकल आफीसर को कई बार लिख कर भेजा-यहां कोई दवा नहीं है। रोगियों का इलाज कैसे हो? जरूरी दवाओं की फेहरिश्त भेजी जा रही है. मेहरबानी करके इन्हें जल्द भिजवाइए। मगर हर बार जवाब नदारद। आज की हुकूमत में यही है कस्बाई अस्पतालों का हाल।'
      वैद्य चंद्रप्रकाश की बीमारी की खबर फैलते ही अस्पताल के सामने मैदान उनके प्रशंसकों से भर गया। उन्होंने देखा चंद्रप्रकाश के बड़े भाई वैद्य सूर्यनारायण दुबे एक पेड़ की छाया में घास पर बिछी दरी पर अपने चमचों से घिरे बैठे हैं और छालिया काट कर फांकते हुए गपशप कर रहे हैं।
      चंद्रप्रकाश हमउम्र होने के नाते मेरे जिगरी दोस्त थे, जो मुझसे कोई बात नहीं छिपाते थे। डाक्टर वर्मा से मैंने उनका हाल पूछा, तो उन्होंने कहा-'क्या होगा , कुछ कहा नहीं जा सकता। अस्पताल में डायरिया की कोई दवा नहीं है। चीनी और नमक मिला गोल थोड़ी-थोड़ी देर में गला तर करने भर के लिए देते जाइए।'
      मैंने वैद्य सूर्यनारायण दुबे से पूछा-'डायरिया की शर्तिया दवा जब आपके पास है, तो आप उसे क्यों नहीं दे रहे?'
      जवाब मिला-'बहुत खोजा। नहीं मिल रही।'
      'तो यहां बैठने से क्या मिलेगा? जाइए, खोजिए।'
      मैंने चंद्रप्रकाश से पूछा-' डायरिया की वह दवा कहां रखी है, जिससे आपने सैकड़ों रोगियों को अच्छा किया था? आपके भाई साहब को मिल नहीं रही।'
      वह सबसे बड़ी बोतल में है। भाई साहब जानते हैं। वही रखते हैं।'
      मुझे लगा बड़े भाई जानबूझ कर वह दवा नहीं देना चाहते, क्योंकि उनक मन में कोई खोट है। तभी तो वे छोटे भाई को देखने और हाल चाल पूछने तक उनके पास नहीं आते, जबकि दूसरे लोग देखने और हाल पूछने आ रहे हैं।
      मैं मित्र के पास बैठा नमक और चीनी का घोल थोड़ी-थोड़ी देर में सूती से दे रहा था, क्योंकि चम्मच नहीं मिली।
      थोड़ी देर बाद मित्र अचानक छोटे बच्चे की तरह हिचकी भर कर रो उठे। वह हिचकी उनके बड़े भाई ने भी सुनी। मगर वे टस से मस नहीं हुए।
      मैंने उनसे रोने की वजह पूछी, तो उन्होंने धीमी आवाज में कहा, 'भाई साहब मेरे हिस्से की जायदाद हथियाने के लिए मुझे जिंदा नहीं देखना चाहते शर्मा। वे जानते हैं कि वह दवा कहां रखी है।'
      'मुझे भी ऐसा ही लगता है। उनकी नीयत में खोट है। वरना वे  अब तक दवा ले आये होते। यहां बैठे गपशप न करते होते।'
      मैंने उन्हें ढांढ़स बंधाते हुए कहा-' रोइए नहीं। तबीयत और बिगड़ जायेगी। आपने सैकड़ों लोगों को मरने से बचाया है।वे सब यहा हाजिर हैं और आपके जल्द अच्छा होने के लिए भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं। '
      ' वह सब बेकार है शर्मा। मैं अब  नहीं बचूंगा। तुम मेरा एक काम करोगे?'
      'हां, हां। कहिए।'
      'मेरी ससुराल खबर भेज कर मेरी पत्नी को बुला लो। उसकी बहुत याद आ रही है। जानते हो शर्मा! मैंने शादी के वक्त,उसके पहले और बाद में उसका मुखड़ा नहीं देखा।'
      'यकीनन वह बहुत खूबसूरत होगी। जब शादी हुई थी, तब वह शुरू से आखिर तक लंबा घूंघट काढ़े रहती थी। मरने के पहले उसका प्यारा मुखड़ा देखने की बड़ी लालसा है शर्मा। देख लूंगा, तो शांति से मरूंगा।'
      मैं उनके बड़े भाई के पास आया और धीरे से उनके कान में कहा,'चंद्रप्रकाश जी अपनी पत्नी से मिलना चाहते हैं। बुला लीजिए।'
      उन्होंने कहा-'बिना गौना के वह ससुराल कैसे आयेगी? गौना कराने का मुहूर्त तीन माह बाद निकला है।'
      'ससुराल नहीं, अस्पताल तो आ सकती है।'
      उन्होंने टका सा जवाब दिया-'कहा न, बिना गौना नहीं।'
      अब मुझे पक्का यकीन हो गया कि मित्र का यह कहना गलत नहीं है कि भाई साहब मुझे जिंदा नहीं देखना चाहते।
      मित्र ने मुझे अपने बड़े भाई से बतियाते देख लिया था। लौट कर मैंने कहा-' आपके भाई ने कहा है, किसी से भेज कर हमारी भाभी को बुलाये लेते हैं।'
      'झूठ। सरासर झूठ। तुम कुछ कर सकते हो तो करो। तुम नहीं जानते शर्मा, मरे बड़े भाई के मेरे प्रति दुश्मन जैसे व्यवहार को देख कर पिता जी अपने जीते जी जायदाद का , जिसमें चार सौ बीघा खेत भी हैं, बंटवारा करना चाहते थे।
      'किंतु मेरी किस्मत को यह मंजूर नहीं था। तभी तो अचानत दिल का दौरा पड़ने से वे चल बसे। वह तो पिता जी मेरी शादी पक्की कर गये थे, इसलिए भाई को मजबूरन करनी पड़ी। वरना वे मुझे कुमारा ही रखते।'
      मैंने पूछा-'जब आपकी तबीयत खराब होने लगी थी, तब आपने वह संजीवनी बूटी क्यों नहीं खा ली।'
      उन्होंने कहा, 'मैं पास के एक गांव में मलेरिया के एक रोगी को देखने गया था। वहां का पानी पीने के कुछ देर बाद ही डायरिया हो गया। तब मेरे जोला में दवा नहीं थी।'
      'डायरिया का हमला इतना तेज था कि कै और दस्त बंद ही नहीं हो रहा था। तभी कुछ लोग मुझे बैलगाड़ी में लाद कर नीम बेहोशी की हालत में इस अस्पताल में चोड़ गये। आधी रात को।'
      'सुबह ठंडी हवा लगने से हालत कुछ सुधरी, तो डाक्टर साहब ने कंपाउंडर को भेज कर भाई साहब को बुलाया। मगर वे खाली हाथ आये। दवा नहीं लाये।'
      मैंने मित्र को ढांढ़स बंधाया -'मैं सब समझ गया हूं। चिंता न करें। सुधीर को साइकिल से आपकी ससुराल भेज दिया है। बीस मिनट में पहुंच जायेगा। तीन मील ही तो है। '
      मित्र ने पूछा-'सुधीर कौन है?'
      'भूल गये। अरे वही, कमला स्टोर का मालिक। एक साल पहले मेरे साथ आपकी शादी में गया था।'
      'होगा, मुझे याद नहीं।'
      आधा घंटा बाद मित्र की हालत तेजी से बिगड़ने लगी। आवाज भी धीमी हो गयी। उनका गला तर करने के लिए मैं चीनी-नमक का घोल मुंह में डाले जा रहा था। पांच-पांच मिनट में।
      थोड़ी देर बाद मित्र की आंखें बंद हो गयीं, तो मैं घबड़ा गया। नाड़ी देखी, चल रही थी। मेरे छूते ही उन्होंने आंखें खोल दीं और पूछा-'वह आ गयी क्या?'
      'नहीं, सुधीर ने आ कर बताया, बारिश हो जाने से कच्चे रास्ते में बैलगाड़ी नहीं चल सकती। इसलिए भाभी को लाने के लिए डोली और कहारों का इंतजाम किया जा रहा है। इसीलिए आने में देर हो रही है।'
      मित्र की खुशी के लिए मैंने यह सब मनगढंत कहा था।
      'ठीक है। मैं सो जाऊं तो उसके आते ही जगा देना।'
      किंतु पत्नी के आगमन की खुशी में उन्हें नींद नहीं आ रही थी। रह-रह कर पूछ लेते-'वह आ गयी क्या?'
      मैंने उन्हें समझाया-'भाभी जी चल दी हैं। रास्ते में हैं। कीचड़ की वजह से नहर के रास्ते से आ रहे कहार धीरे-धीरे चल रहे हैं, जिससे पैर फिसल जाने से डोली उलट न जाये।'
      मित्र को मेरी हर झूठी बात सच लग रही थी। अब उनकी आवाज इतनी धीमी हो गयी थी कि उनके मुंह के पास कान ले जाने पर ही सुनाई देती। मुझे लग रहा था, मित्र की अब विदा की वेला है।
      पत्नी का मुख देखने की लालसा  ही उन्हें बचाये हुए है। मैंने बाहर देखा-'उनके बड़े भाई साहब पहले की तरह छालिया कतरते गपशप कर रहे थे। वे एक बार भी छोटे भाई से बतियाने और हालचाल पूछने नहीं आये थे। जैसे वे उनकी मौता का इंतजार कर रहे हों।
      कुछ देर बाद मित्र की हालत देख कर ऐसा लगा कि आशा का दीपक टिमटिमा रहा है, जो किसी भी वक्त तेज रोशनी के साथ बुझ जायेगा।
      मित्र ने धीमी आवाज में पूछा-'आ गयी क्या?'
      'बस नजदीक आ गयी हैं। उनका एक आदमी आकर खबर दे गया है।'
      'अच्छा।' कह कर उन्होंने आंखें बंद कर लीं।
      थोड़ी देर बाद उनका बोलना बंद हो गया। उन्होंने सिर घुमा कर इधर-उधर देखा, जैसे किसी को खोज रहे हों, फिर उनकी आंखें मुंद गयीं और धीमे स्वर में सुनाई दिया-' वह आ....' यह वाक्य पूरा न हुआ। उनका सिर एक ओर लुढ़क गया। फिर मुंदी आंखें  कभी नहीं खुलीं। उनकी आशा का दीप बुछ गया।

Sunday, May 19, 2013

अति प्रचंड रवि ताप


-डॉ. रुक्म त्रिपाठी
मृग मरीचिका जल सदृश,
लहर-लहर लहराय।
हरिण भागता ही रहे,
किंतु बूंद नहिं पाय।।
पशु, पक्षी व्याकुल फिरें,
नही जलाशय पास।
चहुंदिशि सूखा ही दिखे,
कैसे बुझेगी प्यास।।
सिंह और मृग खोजते,
मिल कर शीतल छांव।
ऐसे संकट के समय,
उनमें नहीं दुराव।।
सूखी जीभ निकाल कर,
लक-लक करता श्वान।
नेत्र बंद कर हांफता,
संकट में है प्रान।।
सुमुखि सुलोचनि कामिनी,
भूल साज शृंगार।
रह-रह करवट बदलती,
व्याकुल बारंबार।।
नहीं सुनायी दे रही,
अब कोयल की कूक,
लगता वह अब चल बसी,
लग जाने से लूक।।
धूल बवंडर बन उठे,
सूखे कूप तड़ाग।
जल विहीन सरिता दिखे,
बिन सिंदूरी मांग।।
पथ-खोरें सुनसान सब.
सन्नाटा है व्याप।
शन : शन : है बढ़ रहा,
अति प्रचंड रवि ताप।।
हवा चले अरहर लगे,
ले हर-हर का नाम।
खड़ी अकेली मोड़ पर,
भजती शिव अविराम।।

Thursday, May 16, 2013

पहचान !



जब जब निर्वाचन होते हैं, प्रत्याशी निरीह बन जाते।
याचक बन कर वोट मांगते, फिर दर्शन दुर्लभ हो जाते॥
पांच साल में एक बार वे, हाथ जोड़ कर बनें भिखारी।
तब ऐसा वे ढोंग रचाते, जब मति मारी जाय हमारी॥
सबसे बड़ी भूल यह होती, हम उनको पहचान न पाते।
उनका हाव भाव लख कर के, महा मूर्ख  उल्लू बन जाते॥
जीत गए तो दर्शन दुर्लभ, सेवक तब स्वामी बन  जाते।
हम भी उनके मतदाता हैं, मिलें अगर पहचान न पाते॥
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Tuesday, April 23, 2013

तब और अब !



पहले नहीं हुआ करती थी, जैसी राजनीति अब होती।
घृणित आचरण के चलते वह, दिन-दिन निज मर्यादा खोती॥
पहले सभ्य, शिष्ट होते थे, राजनीति वाले मतवाले।
अब बहु बाहुबली घुस आए, जिनकी अपनी होती चालें॥
जब भी निर्वाचन होते हैं, सब से अधिक टिकट वे पाते।
भय से, छल से, निज दल  को हैं जो जय दिलवाते॥
राजनीति नहिं सज्जन की अब, नहीं बाहुबल, जो धनवाला।
वही कभी कहलाया करता, प्रत्याशी था सबसे  आला॥
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Friday, March 15, 2013

पद



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                                    -ÇUæò. L¤€× ç˜æÂæÆUè

Wednesday, March 13, 2013

इनको मत दाद दीजिए !



चमड़ी चली  गयी , मगर दमड़ी नहीं गयी।
ये बेशरम हैं, इनको मत दाद दीजिए ॥
जो हुस्न पूजते हैं, होते हैं इंटेलिजेंट।
ऐसों को अपने पास ही,  आबाद कीजिए॥
नाजुक मिजाज वालों से होती बहुत गलती।
दुतकारिए न इनको, मधुर प्यार दीजिए ॥
गर हुस्न के गरूर से, उनके चढ़े तेवर।
माथा झुका कर , कीमती उपहार दीजिए ॥
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Thursday, January 31, 2013

कब तक होगा रोना?



निर्भय हो चाहे जो करता,ऐसा पाकिस्तान।
लगता बहुत-बहुत भय खाता, अपना हिंदुस्तान॥
भारत के सैनिक का सिर जब, काटा पाकिस्तानी।
लगा हमारे आकाओं  को, नहीं  हुई   हैरानी ॥
संजय या इंदिरा जी होतीं, नहीं इसे सह पातीं।
दुश्मन की छाती पर चढ़ कर, अच्छा पाठ पढ़ातीं॥
पता नहीं इससे भी अप्रिय, आगे क्या है होना।
इस शासन के रहते हमको, कब तक होगा रोना॥
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Friday, January 25, 2013


                          चकल्लस
                          आजादी
पाकिस्तानी सरहद में घुस, हत्या किये हजार।
भारत इसका बदला ना ले, और जताता प्यार ।।
राजनीति में आ बैठे हैं कितने भ्रष्टाचारी।
घूसखोर, हत्यारे दागी, अगणित व्यभिचारी।।
मनमानी जब कमा रहे हैं, जमाखोर व्यापारी।
अन्न सैक़ड़ों टन सड़ जाता, समझ माल सरकारी।।
भारत में ऐसी ही होती, जम कर के बरबादी।
       अन्य देश में ऐसा ही हो क्या, जिन्हें मिली आजादी।।
   -डा. रुक्म त्रिपाठी

Wednesday, January 23, 2013

सुभाष !




यदि प्रधानमंत्री बन जाते, अपने वीर सुभाष ।
तो जनता की पूरन होती, मन चाही सब आश।।
     इतना भ्रष्टाचार न होता, ना होता व्यभिचार।
     न गरीब भूखा मर पाता, महंगाई से हार ।।
पाकिस्तान शत्रु बन करके, लुक छिप कर जो  मारे।
कब का सबक सिखा देते,  करके वारे न्यारे  ।।
     दुर्घटना में नहीं मरे वे, यह है गढ़ी कहानी।
                                    छद्म वेश में यहीं रहे वे, सुन होती हैरानी।।
                             -डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Monday, January 21, 2013


                     कर दिया पराया
चौथेपन में जीवनसाथी, यदि हठात् ही छोड़े साथ।
ऐसा अंधकार छा जाता,राह न सूझे, हुए अनाथ॥
सभी जानते , जब जाना हो, कोई संग न आता ।
सब कुछ यहीं छूट जाता है, जैसा भी हो नाता ॥
     सब सद्ग्रंथ यही कहते हैं, कुछ ऐसी करनी कर जाओ।
     अंतकाल जब जाओ जग से, कष्ट न भोगो सद्गति पाओ॥
जीवनसाथी साठ साल तक, तुमने साथ निभाया।
किंतु अचानक क्या सूझा था, जो कर दिया पराया॥
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Wednesday, January 16, 2013


साथी 
पहली बार जिसे पकड़ा था,
वह था मेरा हाथ।
और कहा था , सारा जीवन,
रहना हमको साथ।।
अगणित कष्ट झेल कर तुमने,
हर क्षण साथ निभाया।
मुझे कष्ट हो तुम सह लेती,
ऐसा कभी  न पाया।
रही प्रेरणा जीवन भर तुम,
तभी आज लिख पाता।
वरना पहले छंद काव्य से,
नहीं रहा था नाता।।
तुम वसंत बन कर आयीं,
आंधी बन कर छोड़ा साथ।
साठ बरस तक संग निभाया, 
 अब कर गयीं हठात अनाथ।।
-डॉ. रुक्म त्रिपाठी

Thursday, June 28, 2012

‘बाजार में खड़ी है पत्रकारिता, जो कीमत चुकाता है, उसकी बोली बोलने लगती है’

 वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार डॉ. रुक्म त्रिपाठी के उद्गार
-राजेश त्रिपाठी
कोलकाता : पिछले दिनों यहां भारतीय भाषा परिषद के सभागार में हिंदी पत्रकारिता के 186 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में स्थानीय हिंदी दैनिक ‘छपते छपते’ के तत्वावधान में ‘हिंदी पत्रकारिता की 186 वर्ष की यात्राः एक सिंहावलोकन’ विषय पर परिचर्चा और हिंदी के पांच वयोवृद्ध पत्रकारों के सम्मान का समारोह आयोजित किया गया। इसमें डॉ. रुक्म त्रिपाठी, संतन कुमार पांडेय, सुदामा प्रसाद सिंह, मोहम्मद इसराइल अंसारी व रामगोपाल खेतान को पत्रकारिता में उनकी सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.कृष्णबिहारी मिश्र व कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता ने किया। डॉ.मिश्र ने अपने संबोधन में युवा पत्रकारों से पत्रकारिता के उत्कृष्ण प्रतिमानों को पुनः स्थापित करने की अपील की। उन्होंने हिंदी समाचारपत्रों के गौरवमय अतीत की याद दिलाते हुए कहा कि आज पत्रों के कलेवर तो बेहतर हुए हैं लेकिन उनमें संस्कारों और राष्ट्रीय मूल्यों के प्रति संघर्ष का भाव नहीं रहा। उन्होंने कहा कि पाठकों का दबाव ही समाचारपत्रों को फिर से जनोन्मुखी बनायेगा।

समारोह के मुख्य अतिथि कलकत्ता उच्च न्यायालय के जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता ने भी समाचापत्रों के स्तर और मूल्यों में गिरावट के प्रति चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि समाचारपत्रों के संपादकों और पत्रकारों को खुद इस बारे में समीक्षा करनी चाहिए कि यह स्थिति क्यों आयी।
छपते छपते हिंदी दैनिक परिवार की ओर से पांचों सम्मानित पत्रकारों का सम्मान स्मारक चिह्न प्रदान करने के अलावा शाल ओढ़ा कर और उत्तरीय प्रदान कर सम्मानित किया गया। सम्मानित पत्रकारों ने पत्रकारिता के बारे में अपने विचार व्यक्ति किये। पत्रकारिता के गिरते स्तर के बारे में डॉ. रुक्म त्रिपाठी ने कहा कि आज पत्रकारिता बाजार में खड़ी है, जो भी उसकी कीमत चुकाता है, यह उसी के बोल बोलने लगती है। 
इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. रुक्म त्रिपाठी ने कहा-‘ मैंने आधी शताब्दी से भी अधिक समय पत्रकारिता और लेखन में गुजारा है। मैं पत्रकारिता के अतीत से वर्तमान तक से सक्रिय रूप से जुड़ा रहा हूं और इसके उत्थान-पतन का साक्षी रहा हूं। आज जब हम इसकी उपलब्धि का आकलन करते हैं तो हमारे सामने इसके उत्कर्ष और पतन के पक्ष उजागर होते हैं। पत्रकारिता का जिसे स्वर्ण युग कह सकते हैं वह इसके प्रारंभ के वर्ष थे जब इसका उद्देश्य, इसके सिद्धांत और निष्ठा ही इसका सबसे बड़ा धन होते थे। यह सत्यम् शिवम् सुंदरम् के उद्देश्य पर आधारित पत्रकारिता थी। यानी जो सत्य है कल्याणकारी है उसकी प्रतिष्ठा और जो स्वेच्छारिता, अन्याय अनाचार है उसकी निर्भीक होकर समालोचना ही इसका धर्म था। तब पत्रकार एक ध्येय एक निष्ठा लेकर चलते थे जो बिकाऊ नहीं थी। तब पैसे के मोह में सामाजिक दायित्वों को तिलांजलि दे कोई ठकुरसुहाती नहीं लिखता था। वह स्वाधीनता आंदोलन का युग था। हिंदी पत्रकारिता ओतप्रोत भाव से इस आंदोलन को प्रोत्साहित करने इसे अपना सक्षम समर्थन देने में जुटी थी। पत्रकारिता के कई मनीषियों को इसके चलते ब्रिटिश राज का कोपभाजन भी बनना पड़ा लेकिन वे अपने उद्देश्य से नहीं डिगे। हिंदी पत्रकारिता का अतीत जितना निर्मल और उज्जवल था, इसका वर्तमान उतना ही कलुषित, दिशाहीन और सामाजिक सरोकार से कटा हुआ है।आज जब हम इसके अतीत और वर्तमान का आकलन करने बैठते हैं तो सबसे पहले यही प्रश्न आता है कि क्या वर्षों पूर्व जब पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था,तब से आज तक क्या यह अपने उद्देश्यों और सिद्धांतों पर अडिग रह पायी है। हमें दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि पत्रकारिता अपने मूल्य उद्देश्यों और न सिद्धांतों ने न सिर्फ भटकी है अपितु दिशाहीन भी हो गयी है। आज इसमें मूल्यों का क्षरण, सिद्धांतों और उद्देश्यों का निर्मम हनन हो रहा है। यह अपने सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों से विमुख हो स्वेच्छारी और स्वार्थी हो गयी है।

कभी पकारिता मिशन थी आज मोनोपोली है। जिसकी जैसी इच्छा अपने हित में इसका इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में इसका सत्यम् शिवम् सुंदरम् का सिद्धांत छीजता जा रहा है। कभी देश के स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरक और प्राण शक्ति रही पत्रकारिता उद्देश्यहीन हो बाजार में आ खड़ी ई है। जो चाहता है इसकी मुंहमांगी कीमत चुकाता है और यह उसके ही बोल बोलने लगती है। अपने सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे यह ऐसे हाथों में खेलने लगी है,जो इसे स्वेच्छाचारी और स्वार्थी बना रहे हैं। यह पतन की उस राह पर चल पड़ी है, जहां से अगर इसे अभी नहीं उबारा गया तो बहुत देर हो जायेगी।
 वैसे इस अराजक दौर और निराशा के घटाटोप में भी ऐसे निष्ठावान पत्रकार आज भी हैं जिनकी कलम बिकाऊ नहीं है। यही भविष्य के लिए उम्मीद की किरण हैं। आज पत्रकारिता ऊहापोह और विवशता के दोराहे पर आ खड़ी हुई है। दोराहा जहां उसके सामने व्यावसायिकता और राजनीतिक व अन्य दबावों का संकट है। दिनों दिन प्रकाशन संबंधी वस्तुओं की कीमतों से उसके सामने अस्तित्व का भी संकट है जिसके चलते उसे न चाहते हुए भी कुछ ऐसे समझौते करने पड़ते हैं जहां मूल्यों और सिद्धांतों को बलि देने को विवश होना पड़ता है। गलाकाट प्रतियोगिता और बदलते सामाजिक, राजनीतिक मूल्यों से उपजे दबाव के चलते पत्रकारिता अपने मूल्य उद्देश्यों से भटकती जा रही है। ऐसे में हमें यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि क्या वाकई पत्रकारिता 186 साल बाद उस ऊंचाई पर पहुंची है जहां उसे होना चाहिए था। जहां उसके पहुंचाने का स्वप्न इसके पुरोधाओं ने देखा था। क्या वाकई वह सार्थक और सक्षम तौर पर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की भूमिका निभाने में सफल रही है। जहां तक पत्रकारिता की प्रगति का प्रश्न है इसने तकनीकी ढंग से बेहद प्रगति की है लेकिन उसके नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आज जो चाहे इसे अपने ढंग से इस्तेमाल कर सकता है। कभी पत्रकारिता मिशन थी आज मोनोपोली है। जिसकी जैसी इच्छा अपने हित में इसका इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में इसका सत्यम् शिवम् सुंदरम् का सिद्धांत छीजता जा रहा है। कभी देश के स्वाधीनता आंदोलन की प्रेरक और प्राण शक्ति रही पत्रकारिता उद्देश्यहीन हो बाजार में आ खड़ी ई है। जो चाहता है इसकी मुंहमांगी कीमत चुकाता है और यह उसके ही बोल बोलने लगती है। अपने सामाजिक सरोकारों को तिलांजलि दे यह ऐसे हाथों में खेलने लगी है,जो इसे स्वेच्छाचारी और स्वार्थी बना रहे हैं। यह पतन की उस राह पर चल पड़ी है, जहां से अगर इसे अभी नहीं उबारा गया तो बहुत देर हो जायेगी। वैसे आज भी कुछ सार्थक पत्रकारिता के सारथी हैं जिन्हें अपने ध्येय, अपनी निष्ठा और सिद्धांतों से प्रेम है, वे बिके नहीं और यही हमारे लिए आशा की किरण के समान हैं। इन्हें प्रणाम और इसके कार्य को साधुवाद।’


कार्यक्रम के सूत्रधार और छपते-छपते के संपादक विश्वंभर नेवर ने अपने स्वागत भाषण में पत्रकारों की अंतर्वेदना और संघर्ष का जिक्र किया। संचालन सुश्री राजप्रभा दासानी ने किया।



जस्टिस कल्याण ज्योति सेनगुप्ता उत्तरीय प्रदान कर
 डॉ. रुक्म त्रिपाठी का सम्मान कर उनसे हाथ मिलाते हुए।
 साथ हैं डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र और विश्वंभर नेवर






Wednesday, February 9, 2011

स्वागत श्री ऋतुराज

डा. रुक्म त्रिपाठी
कुहू कुहू कर कोकिला,
गाती फिरती आज।
कृपया स्वागत कीजिए,
आये श्री ऋतुराज ॥

गुन गुन करता बाग में,
गाता है मृदु छंद ।
अली कली मुख चूम कर,
चूस रहा मकरंद ॥

विरही भामिन भावती,
दूर बसे जा कंत।
जाने अब कब मिलन हो,
बीत न जाय बसंत ॥

कामदेव-रति से लगें,
आनंदित दो मित्र ।
यदाकदा दिख रहे ज्यों,
खजुराहो के चित्र ॥

मलयानिल है बांटता,
मनमोहिनी सुवास ।
मनमयूर नर्तन करे,
जब प्रिय हों अति पास ॥

सरसों फूले खेत में,
पसरा आज बसंत।
रंग बसंती का नहीं,
दूर दूर तक अंत ॥

कहीं कहीं होने लगी,
ढोलक ध्वनि संग फाग।
लाल लाल टेसू लगें,
वन में दहकी आग ॥

निर्झर का झर झर लगे,
बजता ज्यों संतूर ।
मानो वह ऋतुराज पर,
मुग्ध आज भरपूर ॥

पतझड़ बीते ही दिखे,
नवपल्लव का दौर।
अतिशय यौवन-भार से,
झुकी आम की बौर ॥

Monday, January 24, 2011

मोरारजी का आटोग्राफ

डा. रुक्म त्रिपाठी
प्रसंग पचास के अर्धदशक का है। वैष्णव देवी कटरा स्थित विश्वायतन योगाश्रम से स्वामी कार्तिकेय के शिष्य स्वामी हरि भक्त चैतन्य तथा धीरेंद्र ब्रह्मचारी योग का प्रचार करने कलकत्ता आये थे। उन्होंने रेड रोड के बगल में स्थित मोहम्मडन स्पोर्टिंग क्लब के निकट विश्वायतन योग शिविर आरंभ किया।
स्वामी हरिभक्त जितने गंभीर थे, उनके गुरु भाई धीरेंद्र उतने ही मुखर। योग प्रशिक्षण धीरेंद्र जी ही देते थे। हरिभक्त जी केवल प्रशिक्षणार्थियों को देखते रहते थे। चूंकि कलकत्ता का फेफड़ा कहलाने वाले विक्टोरिया मेमोरियल के मैदान जानेवाले वायु सेवनार्थी रेड रोड से गुजरते थे, इसलिए उनमें से योग के प्रति रुचि रखनेवाले शिविर में प्रशिक्षणार्थ आने लगे।
उस शिविर में योगिक क्रिया देखने के लिए बहुतों के कदम रुक जाते।
एक दिन प्रसिद्ध नेता मोरारजी भाई देसाई भी जब वहां पधारे तो प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे, धनाढ्य परिवार के दो नन्हें बच्चे अपनी आटोग्राफ बुक उनकी ओर बढ़ाते हुए आटोग्राफ मांगने लगे। तो मोरारजी ने उन्हें लंगोट और गंजी पहने देख कर कहा-‘पहले खद्दर पहन कर आओ।’
उनकी शर्त सुनते ही बच्चे निराश हो गये।
उन दिनों मैं खद्दर ही पहनता था। मैंने खद्दर का पाजामा और कुर्ता पहन कर दोनों की आटोग्राफ बुक लेकर मोरारजी से कहा-‘मैं खादी ग्रामोद्योग भवन के शुद्ध खद्दर से बने कुर्ता, पाजामा पहने हूं, कृपया अब तो आप आटोग्राफ देने से इनकार नहीं करेंगे। ’
उन्होंने मेरा कुर्ता-पाजामा देखा और दोनों आटोग्राफ बुक में आटोग्राफ दे दिया। मैंने बच्चों को उनकी बुक लौटाने के बाद हाथ जोड़ कर मोरारजी से प्रार्थना की,‘आप राष्ट्रीय स्तर के सर्वमान्य नेता हैं , रईस घरों के नन्हें बच्चे खद्दर क्यों पहनने लगे? अपनी शर्त में इन नन्हें- मुन्नों को छूट दे दी होती, तो वे उदास न होते, आपके चरण छू लेते। ’
मोरारजी ने कोई उत्तर नहीं दिया। अन्यमनस्क हो मैदान की ओर वायु सेवन के लिए चल दिये।
कालांतर में जब वे प्रधानमंत्री बने, तो जापान की एक युवती जब उनसे मिलने गयी, तो उन्होंने उसे सहर्ष आटोग्राफ दे दिया। तब सिंथेटिक कपड़े पहने उस युवती को उन्होंने खादी पहन कर आने को नहीं कहा।
जब यह समाचार अखबारों में उछाला गया, तो मैंने एक शिकायती पत्र मोरारजी के पास भेजा था, जिसमें उन नन्हें मुन्नों को आटोग्राफ देने से इनकार करने का जिक्र था। मैंने अपने पत्र में पूछा था , -‘उस जापानी युवती को आपने शर्त में छूट क्यों दी?’ किंतु अफसोस, उन्होंने मेरे उस पत्र का उत्तर कभी नहीं दिया।

Saturday, June 19, 2010

बच गये बेचारे सूर, तुलसी



वरना ये महाशय उन्हें कचडे के ढेर में फिकवा कर दम लेते
-डॉ.रुक्म त्रिपाठी

एक पत्रकार और कहानीकार, जिन्हें आप सहज ही पहचान जायेंगे वे आयु में सत्तर पार कर चुके हैं किंतु अपने को नये लेखकों का ‘गॉडफादर’ मानते हैं और उन्हें मंच देने के लिए पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों की अपेक्षा उन्हीं की रचनाएं छापते हैं।
उनका कहना है, ‘नितांत नये लेखकों की पुस्तकें किसी भी स्थापित लेखक से कम नहीं बिकतीं। नये लेखकों की पुस्तकों के दूसरे संस्करण भी छप रहे हैं। इसका कारण है कि नये लेखकों का सृजन फलक बड़ा है। मेरी समझ से नयी पीढ़ी , हवा के ताजे झोंके की तरह आयी और पुरानी पीढ़ी द्वारा फैलाये गये प्रदूषण को बुहार कर कूड़े के ढेर में फेंक दिया। इनके कथ्य, इनकी भाषा. इनकी संवेदना और तेवर बिल्कुल नये और ताजे हैं, जो हर उम्र के पाठकों को मोह रहे हैं।’ (जैसे आप जैसे सत्तर वर्षीय युवा संपादक को मोह रहे हैं)।
बड़बोले जी! हमें आश्चर्य है कि शिक्षा विभाग आज भी छोटी कक्षाओं से लेकर स्नातकोत्तर तक पुरानी पीढ़ी के रचनाकारों के प्रदूषण फैलाने वाले साहित्य को पाठ्यक्रम के रूप में क्यों रखे है? उसे कूड़ेदान में फेंक कर नयी पीढ़ी के साहित्य को क्यों नहीं रखता? कथाकार प्रेमचंद, ‘कामायनीज’ के रचनाकार जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, अमृतलाल नागर, भैरवप्रसाद गुप्त, आचार्य शिवपूजन सहाय, यशपाल, कृष्णचंदर आदि की पुस्तकों के अब तक दर्जनों संस्करण निकल चुके हैं और आगे भी निकलेंगे। पाठकों में प्रदूषण फैलानेवाले इनके साहित्य को कूड़े में क्यों नहीं फेंक दिया जाता?
बड़बोले जी को इस ज्ञान की प्राप्ति तब हुई , जब उनके राज्य से उन्हें वहां का निवासी साहित्कार होने के नाते ढाई लाख का पुरस्कार मिला है। (किसी अन्य राज्य ने उनके साहित्य सृजन का ऐसा मूल्यांकन क्यों नहीं किया?)।
उनका कहना है कि अब मैं ढाई लाख से कम का पुरस्कार ग्रहण नहीं करूंगा। लाख रुपये के पुरस्कार छुटभैयों के लिए छोड़ रहा हूं।
शायद उन्हें पता नहीं है (बड़े नगरवासी होने के कारण) कि नयी शैली की कहानियों और छंदमुक्त कविताओं के पाठक मुश्किल से बीस प्रतिशत हैं, जबकि प्राचीन साहित्य ग्रामीण पाठकों में आज भी लोकप्रिय है , जो बार-बार पढ़ा जाता है। विश्वास न हो तो गांवों के पाठकों की रुचि का सर्वे करवा कर देख लीजिए। मेरा जन्म गांव में हुआ है इसलिए मैं आज भी वहां देवकीनंदन खत्री और प्रेमचंद के उपन्यास तथा कहानियों को बड़े चाव से पढ़ते देखता हूं।
क्षमा करें बड़बोले जी! आपने सत्तर से अधिक उम्र का होते हुए भी पुरानी पीढ़ी के सम्माननीय, आपसे अधिक प्रतिष्ठित विद्वान लेखकों की रचनाओं को प्रदूषण फैलानेवाला कहा इसलिए बरदाश्त नहीं हुआ। आप भी तो मां के पेट से साहित्य सीख कर नहीं आये, इस प्रदूषण (आपकी भाषा में, हम तो इसे पावन चंदन की सुगंध मानते हैं) को पढ़ कर ही तो आपने साहित्य सृजन की शक्ति और सामर्थ्य पाया। यह तो आपका आधार है इसे ही काट देंगे तो औंधे मुंह जमीन पर आ गिरेंगे। एक बात और कहा गया है कि विद्या ददाति विनयम् विनयात यात पात्रताम् यानी विद्या विनय देती है और विनयी भाव से ही व्यक्ति में पात्रता या योग्यता आती है। इतना दंभ आपमें कहां से भर गया कि आप उस साहित्य के शलाका पुरुषों को ही कचड़ा कहने लगे जिसे सीख कर आप आज इतनी ऊंचाई पर पहुंचे हैं। बड़बोले जी! ऊंचाई में चढ़ने के बाद उन सीढ़िय़ों को नहीं भूला करते जिनके सहारे आप वहां पहुंचे हैं खुदा न खास्ता कल ऊंचाई आपको नकार दें तो आप कहां जायेंगे।
काश आपको साहित्य का नोबल पुरस्कार मिल गया होता तो पता नहीं सूर, तुलसी, रहीम, कबीर, बिहारी, केशव,पद्माकर, केशव, विद्यापति आदि की ये कैसी आरती उतारते।
हम नये रचनाकारों के साहित्य सृजन विरोधी नहीं हैं। उनमें नयी दृष्टि. नयी शैली और नया सोच है। वे बेहतर लिख रहे हैं। साहित्य में नया रंग नया प्रकाश ला रहे हैं। युग परिवर्तनशील है और साहित्य में भी यह परिवर्तन सुखद संकेत और इसकी श्री वृद्धि का परिचायक है लेकिन शायद वे भी अपने शलाका पुरुषों (जिनके साहित्य ने उन्हें राह दिखायी) को कचड़ा या प्रदूषण फैलानेवाला नहीं कहेंगे। बड़बोले जी! माफ कीजिएगा सूरज पर थूकने से अपने ही सिर पर आ गिरता है। संभलिए और अपने से बड़ो को सम्मान देना सीखिए। आप साधारण इनसान हैं खुद को साहित्य का भगवान मानने का भ्रम मत पालिए। लिखना कम समझना ज्यादा। आशा है अन्यथा नहीं लेंगे।

Wednesday, May 12, 2010

तपिश-त्रासदी के दोहे (1)

सुमुखि, सुलोचनि कामनी,
भूल साज शृंगार।
रह-रह करवट बदलती,
व्याकुल बारंबार।।


नहीं सुनाई दे रही,
अब कोयल की कूक।
लगता वह मूर्च्छित पड़ी,
लग जाने से लूक।।



धूल बवंडर बन उठे,
सूखे कूप-तड़ाग।
जलविहीन सरिता दिखे,
बिन सिंदूरी मांग।।


पथ-डगरें सुनसान सब,
सन्नाटा है व्याप।
शनः-शनः है बढ़ रहा,
अति प्रचंड रवि-ताप।।

तपिश-त्रासदी के दोहे (2)

मृग मरीचिका जल सदृश,
लहर लहर लहराय।
हिरण भागता ही फिरे,
एक बूंद नहिं पाया।।


पशु पक्षी व्याकुल फिरें,
नहीं जलाशय पास।
चहुं दिशि जब सूखा दिखे,
कैसे बुझेगी प्यास ।।


आकुल, व्याकुल सिंह, मृग,
भूल शत्रुवत भाव।
शीतलता की चाह हित,
खोज रहे मिल ठांव।।


सूखी जीभ निकाल कर,
लक-लक करता श्वान।
नेत्र बंद कर हांफता,
संकट में हैं प्राण ।।

Thursday, May 6, 2010

जगेसर काका

कहानी

डॉ. रुक्म त्रिपाठी
जगेसर काका को शहर में देख कर मैं चौंक उठा। सोचा, फौज से छुट्टी मिलने पर गांव जा रहे होंगे। उनके पांव छूते हुए कहा-‘पांव लागूं काका।’
काका ने मुड़ कर देखा, ‘अरे नंदन बेटवा! तुम यहां?’
‘हां, काका। गांव में मिडिल तक स्कूल है। आगे की पढ़ाई के लिए मामा ने यहां बुला लिया। कल से गरमी की एक माह की छुट्टी हो रही है। छोटे भाई चंदन के लिए यह कमीज ली है। कैसी है?’
कपड़े की दूकान में खरीददारी कर रहे जगेसर ने कहा-‘बहुत बढ़िया है। हमने रग्घू बेटवा के लिए कुछ कपड़े खरीद लिये हैं।उसकी महतारी के लिए यह साड़ी ले रहे हैं। उसे लाल रंग बहुत पसंद है। देखो कैसी है?’
सामने फैली लाल रंग की साड़ी पर हाथ फेरते हुए काका ने पूछा।
मैंने कहा,-‘बहुत अच्छी है। मगर रग्घू के लिए मिठाई-इठाई ली है या नहीं?’
‘बहुत कुछ लिया है बेटवा! तुम कब जा रहे हो गांव?’
‘कल काका।’
तभी मैंने देखा एक आदमी लाठी से जिस-तिस आदमी की ऊंचाई नाप रहा है। काका से पूछा, -‘ वो क्या कर रहा है काका?’
‘फौज में भरती करने के लिए जवान तलाश रहा है। तभी तो लोग उसके डर से भाग रहे हैं। और सिपाही उनके पीछे दौड़ रहे हैं।’
‘पकड़ने के लिए?’
‘हां बेटवा। मुझे भी भरती करने के लिए ऐसे ही पकड़ा गया था, यहीं।’
लाल साड़ी और उसी रंग से मेल खाता जंफर ( ब्लाउज) गठरा में बांधते हुए काका ने कहा, ‘जो खरीदना था, सब ले लिया बेटवा। अब चलें।’
‘ठीक है। कल गांव में भेंट होगी।’
काका उठे ही थे कि चार हट्टे-कट्टे आदमियों ने उन्हें धर दबोचा।
मैं चीखा, ‘ये आप लोग क्या कर रहे हैं?’
उनमें से एक ने कहा, ‘यह फौज से भागा हुआ आसामी है। हम बहुत दिनों से इसका पीछा कर रहे हैं।’
मैंने घबरा कर जगेसर काका से पूछा, ‘ क्या यह सच है?’
‘ हां बेटवा, छुट्टी नहीं मिल रही थी। रग्घू बेटवा को देखने की बड़ी इच्छा हो रही थी।’

मैंने उनमें से एक से पूछा, ‘ क्या आप लोग जगेसर काका को पहचानते थे?’
‘कौन जगेसर काका?’
‘यही जिन्हें आप पकड़े हैं।’
‘नहीं।’
‘ तब आप कैसे जान गये कि ये फौजी हैं?’
‘चाल से। हमें सूचना मिली थी कि एक फौजी भाग गया है। फौजी आदमी को हम चाल से पहचान लेते हैं।’
मैंने पूछा, ‘अब क्या होगा?’
‘कोर्ट मार्शल।’
‘जेल जायेंगे?’
उनमें से एक ने कहा, ‘जेल नहीं ऊपर।’
सुनते ही जगेसर काका घबरा उठे।
मैंने पूछा, ‘ऊपर माने?’
‘शूट! अंग्रेज अफसर इसे शूट कर देंगे।’
जगेसर काका ने उस आदमी के पांव पकड़ कर गिड़गिड़ाते हुए प्रार्थना की, ‘मैं बहुत गरीब हूं भइया। मेरे एक छोटा बच्चा और घरवाली के सिवा कोई नहीं है। मेहनत मजदूरी कर के पेट पालते थे। जबरन फौज में भरती कर लिया गया। मुझेमार दिया गया, तो वे दोनों भूखे मर जायेंगे।’
अब मेरे आंसू नहीं रुक सके। मैं समझ गया जगेसर काका को मैं आज अंतिम बार जीता-बोलता देख रहा हूं।
यह काल्पनिक कहानी नहीं हकीकत है। तीस दशक के अंतिम चरण में गोरी सरकार जवानों को ऐसे ही जबरन फौज में भरती कर रही थी। हिटलर के आक्रमण के भय से।
मारे जाने की दिल दहलाने वाली बात सुन कर हिचकी भर कर रोते हुए जगेसर काका ने गठरी खोल कर लाल साड़ी दुकनदार को लौटाते हुए कहा,‘ इसके बदले बेवा के पहनने वाली सफेद साड़ी दीजिए। जंफर भी बदल दीजिए।’
दुकानदार सब सुन चुका था। वह समझ गया था कि कल इस बंदे के मारे जाने के बाद इसकी बीवी बेवा हो जायेगी।इसलिए दोनों लाल कपड़े लेकर सफेद दे दिये।
मैंने देखा, दुकानदार की आंखें भी छलछला आयी थीं।
जगेसर काका ने सफेद साड़ी और जंफर बांध कर गठरी मुझे देते हुए कहा, ‘बेटवा! यह गठरी रग्घू की महतारी को देकर कहना,‘तुम्हारा सुहाग अब कभी नहीं लौटेगा इसलिए मांग का सिंदूर पोंछ ले।’
फिर उन्होंने उन चारों जासूसों से अंतिम बार गिड़गिड़ाते हुए प्रार्थना की,‘आप भी बाल बच्चे वाले होंगे। जरा सोचिए, मेरे माने जाने के बाद ...’
‘अबे, चुप।’
एक जासूस ने काका को बीच में ही टोक कर डांटते हुए कहा,‘उपदेश मत झाड़। चुपचाप चल। वरना मारते पीटते ले जायेंगे।’
ये सुनते ही मैं जोर-जोर से रोने लगा, तो एक जासूस ने मुझे डांटते हुए कहा,‘अबे तू क्यों रोता है बंदर की औलाद। तू भी जायेगा क्या इसके साथ मरने के लिए?’
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काका ने कहा,‘ इसे मत डांटिए। इससे यह सब देखा नहीं जाता। बच्चा है।’
‘बच्चा है तो बच्चे की तरह रहे।’ कह कर एक जासूस ने मेरी ओर गुस्से से देखा तो मैं कांप उठा।
काका के आंसू रुक नहीं रहे थे। मैं गठरी लेकर जाने लगा तो उन्होंने कहा, ‘बेटवा! रग्घू की महतारी से कहना, बच्चे को नाना-नानी के यहां छोड़ कर दूसरी शादी कर ले वरना अकेली पाकप शोहदे पीछे लग जायेंगे। तब चैन से जी नहीं पायेगी। यह सब उससे कह देगा या नहीं?’
मैंने हिचकी भर कर रोते हुए हामी भर ली। फिर उनके पांव छूकर जब उन चारों जासूसों को देखा, तो वे मुझे यमदूत से लगे।
दूसरे दिन जब मैं बस से गांव के लिए रवाना हुआ तो रास्ते में सोचने लगा, कल कोई अंग्रेज काका को गोली मार कर उनकी छलनी हुई लाश को देख कर ठहाका मान कर कहेगा, ‘ ब्लडी ब्लैकमैन! जो भागेगा, वो ऐसे ही शूट किया जायेगा।’
बस से उतर कर मैं पहले जगेसर काका के घर गया। देखा काकी कोई लोकगीत गाती हुई सपा से चावल फटक रही थी। ठह साल का रग्घू पास बैठा सूखी रोटी चबा रहा था। मुझे देखते ही काकी नं फटकना बंद कर रहा, ‘ आओ बेटवा। शहर से आ रहे हो?’
‘हां काकी! काका मिले थे, उन्होंने यह सामान भेजा है।’
‘मेरे लिए क्या भेजा है बापू ने?’ रग्घू ने पूछा।
काकी ने जल्दी-जल्दी गठरी खोली, तो दूसरे सामान के साथ सफेद साड़ी और जंफर देखते ही बोली,‘बस में गठरी बदल गयी है बेटवा!’
मैंने कहा,‘ नहीं काकी। यह गठरी काका ने ही दी है।’
उन्होंने कहा, ‘ जब मैं लाल साड़ी पहनती हूं तो यह सफेद साड़ी क्यों? लगता है किसी विधवा की गठरी से बदल गयी है।’
मैंने रुआंसा होकर काकी को सब कुछ सच-सच बता कर कहा, ‘गठरी बदली नहीं काकी।’
मेरी बात सुन कर काकी सन्न। जैसे उनकी जबान को लकवा मार गया हो। चुप।
उनके आंसू न निकलते देख मैं घबरा गया और उनके पांव छू चुपचाप बाहर निकल गया।